बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका (Role of agriculture in the economy of Bihar): एक समग्र विश्लेषण
परिचय
बिहार की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि (Role of agriculture in the economy of Bihar) है। राज्य की 70% से अधिक ग्रामीण आबादी कृषि और इससे जुड़े कार्यों पर निर्भर है। गंगा नदी के उपजाऊ मैदानों, जलोढ़ मिट्टी, और प्रचुर भूजल संसाधनों के कारण बिहार की कृषि विविध और उत्पादक है। यहाँ धान, गेहूँ, मक्का, दालें, फल, और सब्जियों का उत्पादन होता है, जो न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा देता है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।
कृषि का आर्थिक योगदान
- जीडीपी में हिस्सेदारी: बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान लगभग 18-20% है, जो राष्ट्रीय औसत (14%) से अधिक है।
- रोजगार सृजन: राज्य की 58% श्रमशक्ति कृषि क्षेत्र में संलग्न है, जो ग्रामीण गरीबी उन्मूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- उद्योगों को आधार: चीनी, जूट, और खाद्य प्रसंस्करण जैसे उद्योग कृषि उत्पादों पर निर्भर हैं। उदाहरण के लिए, बिहार देश का प्रमुख लीची उत्पादक है, जो राष्ट्रीय उत्पादन का 71% हिस्सा है।
फसल विविधता और उत्पादन
- खाद्यान्न: धान, गेहूँ, और मक्का प्रमुख फसलें हैं। मक्का का उत्पादन 1.5 मिलियन मीट्रिक टन है, जो देश के कुल उत्पादन का 10% है।
- नकदी फसलें: गन्ना, आलू, और मखाना (फॉक्सनट) महत्वपूर्ण हैं। बिहार देश के 85% मखाना का उत्पादन करता है।
- बागवानी: लीची, आम, केला, और अनानास जैसे फलों के उत्पादन में बिहार अग्रणी है। पाइनएप्पल उत्पादन में यह देश में तीसरे स्थान पर है।
- सब्जियाँ: आलू, प्याज, टमाटर, और बैंगन प्रमुख हैं। राज्य का सब्जी उत्पादन 8.6 मिलियन टन है, जो राष्ट्रीय उत्पादन का 9% है।
अवसंरचना और सिंचाई
- कृषि योग्य भूमि: बिहार का 56.03 लाख हेक्टेयर क्षेत्र खेती के अंतर्गत है, जो राष्ट्रीय औसत (42%) से अधिक है।
- सिंचाई सुविधाएँ: 33.51 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित है, लेकिन मानसून पर निर्भरता अभी भी बनी हुई है। उत्तरी बिहार में बाढ़ और दक्षिणी क्षेत्रों में सूखे की समस्याएँ आम हैं।
पशुपालन और डेयरी विकास
- सुधा डेयरी: 1983 में स्थापित डेयरी सहकारी संस्था "सुधा" ने श्वेत क्रांति को गति दी। 2020 में बिहार सरकार ने 5 लाख लीटर प्रतिदिन क्षमता वाले डेयरी संयंत्र का शुभारंभ किया।
- मत्स्य पालन और मधुमक्खी पालन: राज्य में 1,300 मीट्रिक टन शहद का उत्पादन होता है, जो राष्ट्रीय उत्पादन का 14% है।
चुनौतियाँ
- मानसून की अनिश्चितता: कृषि का 60% भाग वर्षा पर निर्भर है, जो उत्पादन में अस्थिरता लाता है।
- बाजार और प्रसंस्करण सुविधाओं का अभाव: किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल पाता, जिससे आय में कमी रहती है।
- उन्नत बीज और तकनीक की कमी: छोटे किसानों तक आधुनिक तकनीक पहुँच नहीं पाती।
- जोत का छोटा आकार: 85% किसान सीमांत या छोटे किसान हैं, जो उत्पादकता बढ़ाने में बाधक है।
सरकारी पहल और भविष्य की रणनीति
- किसान क्रेडिट कार्ड: मत्स्य पालन और पशुपालन से जुड़े किसानों को वित्तीय सहायता।
- बागवानी मिशन: फलों और सब्जियों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएँ।
- ई-नैम मंडियों का एकीकरण: 585 मंडियों को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़कर किसानों को बेहतर मूल्य दिलाना।
- जैविक खेती को प्रोत्साहन: महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जैविक तकनीकों का प्रसार।
निष्कर्ष
बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि न केवल आजीविका का स्रोत है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक स्थिरता का आधार भी है। हालांकि, उत्पादकता बढ़ाने, बाजार पहुँच सुधारने, और जलवायु अनुकूल तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता है। सरकारी योजनाओं के साथ-साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी से बिहार की कृषि नई ऊँचाइयों को छू सकती है।
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बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका (Role of agriculture in the economy of Bihar)? |
स्रोत: यह लेख बिहार की कृषि से संबंधित विभिन्न सरकारी रिपोर्ट्स, अध्ययनों, और विश्वसनीय वेबसाइटों पर उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है।