आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution): स्वदेशी उत्पादन की ओर एक रणनीतिक कदम
प्रस्तावना
आयात प्रतिस्थापन से आप क्या समझते हैं (What do you understand by import substitution)? यह एक आर्थिक नीति है जिसका उद्देश्य विदेशी उत्पादों पर निर्भरता कम करके घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहित करना है। इसके तहत सरकारें टैरिफ, कोटा, या सब्सिडी जैसे उपायों से स्थानीय उत्पादकों को संरक्षण देती हैं, ताकि वे आयातित वस्तुओं की जगह स्वदेशी सामान बना सकें। 1950-80 के दशक में भारत, ब्राज़ील, और मैक्सिको जैसे देशों ने इस मॉडल को अपनाया था।
आयात प्रतिस्थापन की मुख्य विशेषताएँ
- संरक्षणवादी नीतियाँ: आयात शुल्क बढ़ाकर विदेशी सामान को महँगा करना।
- औद्योगीकरण पर जोर: स्टील, मशीनरी, और केमिकल जैसे बुनियादी उद्योगों का विकास।
- स्वदेशी तकनीक को प्राथमिकता: विदेशी प्रौद्योगिकी पर निर्भरता कम करना।
- सरकारी नियंत्रण: लाइसेंस राज (License Raj) और उत्पादन कोटा जैसे नियम।
आयात प्रतिस्थापन के उद्देश्य
- विदेशी मुद्रा की बचत: आयात कम करके व्यापार घाटे को नियंत्रित करना।
- रोजगार सृजन: स्थानीय उद्योगों के विस्तार से रोज़गार के अवसर बढ़ाना।
- आर्थिक संप्रभुता: वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं से बचाव।
- औद्योगिक आधार मजबूत करना: दीर्घकाल में निर्यात क्षमता विकसित करना।
भारत में आयात प्रतिस्थापन का इतिहास
- 1950-1991: संरक्षण का दौर
- द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956): महालनोबिस मॉडल के तहत भारी उद्योगों पर फोकस।
- सार्वजनिक क्षेत्र का प्रभुत्व: BHEL, SAIL, और ONGC जैसी कंपनियों की स्थापना।
- फल: स्टील और दवा उत्पादन में आत्मनिर्भरता, लेकिन नकारात्मक पक्ष – नौकरशाही, गुणवत्ता की कमी, और उपभोक्ता विकल्प सीमित।
- 1991 के बाद उदारीकरण:
- आयात प्रतिस्थापन की जगह निर्यात-उन्मुख नीतियों को अपनाया गया।
- विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) और तकनीक का उदार प्रवाह शुरू हुआ।
आयात प्रतिस्थापन के लाभ और चुनौतियाँ
लाभ | चुनौतियाँ |
---|---|
स्थानीय उद्योगों को संरक्षण | घरेलू उत्पादों की गुणवत्ता में कमी |
विदेशी मुद्रा संकट का समाधान | अक्षमता और उच्च उत्पादन लागत |
रोजगार के नए अवसर | वैश्विक प्रतिस्पर्धा से पिछड़ना |
वैश्विक उदाहरण: सफलता और विफलता
- दक्षिण कोरिया (1960s):
- प्रारंभ में आयात प्रतिस्थापन अपनाया, लेकिन बाद में निर्यात-उन्मुख मॉडल में बदलाव किया।
- लैटिन अमेरिकी देश:
- अर्जेंटीना और ब्राज़ील में यह नीति मुद्रास्फीति और कर्ज संकट का कारण बनी।
वर्तमान संदर्भ: क्या आयात प्रतिस्थापन लौट रहा है?
- आत्मनिर्भर भारत (Atmanirbhar Bharat): 2020 में घोषित इस अभियान में PLI (Production-Linked Incentive) योजना के ज़रिए इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, और ऑटोमोबाइल सेक्टर को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
- चीन के साथ तनाव: गैल्वनाइज्ड स्टील और सौर उपकरणों पर आयात शुल्क बढ़ाकर घरेलू निर्माण को बढ़ावा।
- वैश्विक ट्रेंड: COVID-19 और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद कई देशों ने "रिस्टोरिंग सप्लाई चेन" पर फोकस किया है।
आयात प्रतिस्थापन vs निर्यात-उन्मुख विकास
पैमाना | आयात प्रतिस्थापन | निर्यात-उन्मुख विकास |
---|---|---|
फोकस | घरेलू बाजार की माँग पूरी करना | वैश्विक बाजार के लिए उत्पादन |
नीतियाँ | उच्च आयात शुल्क, कोटा | निर्यात सब्सिडी, मुद्रा अवमूल्यन |
उदाहरण | भारत (1950-1991) | चीन, दक्षिण कोरिया, वियतनाम |
भारत के लिए आयात प्रतिस्थापन की संभावनाएँ
- स्ट्रेटेजिक सेक्टर: सेमीकंडक्टर, डिफेंस उपकरण, और दवाओं में आत्मनिर्भरता ज़रूरी।
- MSME को बढ़ावा: सूक्ष्म उद्योगों को तकनीकी अपग्रेडेशन और वित्तीय सहायता।
- ग्रीन टेक्नोलॉजी: सोलर पैनल और इलेक्ट्रिक वाहनों का घरेलू उत्पादन।
निष्कर्ष: संतुलन की आवश्यकता
आयात प्रतिस्थापन एक समयबद्ध रणनीति हो सकती है, खासकर रणनीतिक और संवेदनशील क्षेत्रों में। हालाँकि, दीर्घकाल में गुणवत्ता, प्रतिस्पर्धा, और नवाचार को बनाए रखने के लिए इसे निर्यात-उन्मुख नीतियों के साथ जोड़ना ज़रूरी है। भारत जैसे देश के लिए "आत्मनिर्भरता" और "ग्लोबलाइजेशन" के बीच संतुलन बनाना ही टिकाऊ विकास का मार्ग है।
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आयात प्रतिस्थापन से आप क्या समझते हैं (What do you understand by import substitution)? |
स्रोत: यह लेख भारतीय आर्थिक नीतियों, विश्व बैंक के अध्ययनों, और वर्तमान सरकारी योजनाओं के आँकड़ों पर आधारित है। तुलनात्मक विश्लेषण में ऐतिहासिक एवं समकालीन उदाहरणों को शामिल किया गया है।